जनवरी 10, 2022

गोवर्धन परिक्रमा वर्णन




श्री गोवर्धन महाराज

मथुरा नगर के पश्चिम में लगभग 21 किमी की दूरी पर यह पहाड़ी स्थित है। यहीं पर गिरिराज पर्वत है जो 4 या 5 मील तक फैला हुआ है। इस पर्वत पर अनेक पवित्र स्थल है। पुलस्त्य ऋषि के श्राप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है। कहते हैं इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अँगुली पर उठा लिया था। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है।


गर्ग संहिता में गोवर्धन पर्वत की वंदना करते हुए इसे वृन्दावन में विराजमान और वृन्दावन की गोद में निवास करने वाला गोलोक का मुकुटमणि कहा गया है। पौराणिक मान्यता अनुसार श्री गिरिराजजी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाए थे। दूसरी मान्यता यह भी है कि जब राम सेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमान जी इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे लेकिन तभी देव वाणी हुई की सेतु बंध का कार्य पूर्ण हो गया है तो यह सुनकर हनुमानजी इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर पुन: लौट गए।


पौराणिक उल्लेखों के अनुसार भगवान कृष्ण के काल में यह अत्यन्त हरा-भरा रमणीक पर्वत था। इसमें अनेक गुफ़ा अथवा कंदराएँ थी और उनसे शीतल जल के अनेक झरने झरा करते थे। उस काल के ब्रज-वासी उसके निकट अपनी गायें चराया करते थे, अतः वे उक्त पर्वत को बड़ी श्रद्धा की द्रष्टि से देखते थे। भगवान श्री कृष्ण ने इन्द्र की परम्परागत पूजा बन्द कर गोवर्धन की पूजा ब्रज में प्रचलित की थी, जो उसकी उपयोगिता के लिये उनकी श्रद्धांजलि थी।


भगवान श्री कृष्ण के काल में इन्द्र के प्रकोप से एक बार ब्रज में भयंकर वर्षा हुई। उस समय सम्पूर्ण ब्रज जल मग्न हो जाने का आशंका उत्पन्न हो गई थी। भगवान श्री कृष्ण ने उस समय गोवर्धन के द्वारा समस्त ब्रजवासियों की रक्षा की थी। भक्तों का विश्वास है, श्री कृष्ण ने उस समय गोवर्धन को छतरी के समान धारण कर उसके नीचे समस्त ब्रज-वासियों को एकत्र कर लिया था, उस अलौकिक घटना का उल्लेख अत्यन्त प्राचीन काल से ही पुराणादि धार्मिक ग्रन्थों में और कलाकृतियों में होता रहा है।


ब्रज के भक्त कवियों ने उसका बड़ा उल्लासपूर्ण कथन किया है। आजकल के वैज्ञानिक युग में उस आलौकिक घटना को उसी रुप में मानना संभव नहीं है। उसका बुद्धिगम्य अभिप्राय यह ज्ञात होता है कि श्री कृष्ण के आदेश अनुसार उस समय ब्रजवासियों ने गोवर्धन की कंदराओं में आश्रय लेकर वर्षा से अपनी जीवन रक्षा की थी।


गोवर्धन के महत्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना यह है कि यह भगवान कृष्ण के काल का एक मात्र स्थिर रहने वाला चिन्ह है। उस काल का दूसरा चिन्ह यमुना नदी भी है, किन्तु उसका प्रवाह लगातार परिवर्तित होने से उसे स्थाई चिन्ह नहीं कहा जा सकता है। इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्णभक्त, वैष्णवजन और वल्लभ संप्रदाय के लोग आते हैं। यह पूरी परिक्रमा 7 कोस (क्रोश) अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है। यहाँ लोग दण्डौती परिक्रमा करते हैं। दण्डौती परिक्रमा इस प्रकार की जाती है कि आगे हाथ फैलाकर ज़मीन पर लेट जाते हैं और जहाँ तक हाथ फैलते हैं, वहाँ तक लकीर खींचकर फिर उसके आगे लेटते हैं।


इसी प्रकार लेटते-लेटते या साष्टांग दण्डवत्‌ करते-करते परिक्रमा करते हैं जो एक सप्ताह से लेकर दो सप्ताह में पूरी हो पाती है। यहाँ गोरोचन, धर्मरोचन, पापमोचन और ऋणमोचन- ये चार कुण्ड हैं तथा भरतपुर नरेश की बनवाई हुई छतरियां तथा अन्य सुंदर इमारतें हैं। मथुरा से डीग को जाने वाली सड़क गोवर्धन पार करके जहाँ पर निकलती है, वह स्थान दानघाटी कहलाता है। यहाँ भगवान दान लिया करते थे। यहाँ दानरायजी का मंदिर है।


इसी गोवर्द्धन के पास 20 कोस के बीच में सारस्वत कल्प में वृन्दावन था तथा इसी के आसपास यमुना बहती थी।


गिरिराज जी छप्पन भोग, गोवर्धन, मथुरा मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, जतिपुरा, मुखारविंद मंदिर, राधाकुण्ड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुण्ड, पूंछरी का लौठा, दानघाटी इत्यादि हैं। राधाकुण्ड से तीन मील पर गोवर्धन पर्वत है। पहले यह गिरिराज 7 कोस में फैले हुए थे, पर अब आप धरती में समा गए हैं। यहीं कुसुम सरोवर है, जो बहुत सुंदर बना हुआ है। यहाँ वज्रनाभ के पधराए हरिदेवजी थे पर औरंगजेबी काल में वह यहाँ से चले गए। पीछे से उनके स्थान पर दूसरी मूर्ति प्रतिष्ठित की गई। यह मंदिर बहुत सुंदर है। यहाँ श्री वज्रनाभ के ही पधराए हुए एकचक्रेश्वर महादेव का मंदिर है।


गिरिराज के ऊपर और आसपास गोवर्द्धन ग्राम बसा है तथा एक मनसा देवी का मंदिर है। मानसी गंगा पर गिरिराज का मुखारविन्द है, जहाँ उनका पूजन होता है तथा आषाढ़ी पूर्णिमा तथा कार्तिक की अमावस्या को मेला लगता है। गोवर्द्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान का चरणचिह्न है। मानसीगंगा पर जिसे भगवान्‌ ने अपने मन से उत्पन्न किया था, दीवाली के दिन जो दीपमालिका होती है, उसमें मनों घी ख़र्च किया जाता है, शोभा दर्शनीय होती है।


परिक्रमा की शुरुआत वैष्णवजन जतिपुरा से और सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और पुन: वहीं पहुँच जाते हैं। पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि यहाँ आने से इस बात की पुष्टि मानी जाती है कि आप यहाँ परिक्रमा करने आए हैं। परिक्रमा में पड़ने वाले प्रत्येक स्थान से कृष्ण की कथाएँ जुड़ी हैं। मुखारविंद मंदिर वह स्थान है जहाँ पर श्रीनाथजी का प्राकट्य हुआ था।


मानसी गंगा के बारे में मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने अपनी बाँसुरी से खोदकर इस गंगा का प्राकट्य किया था। मानसी गंगा के प्राकट्य के बारे में अनेक कथाएँ हैं। यह भी माना जाता है कि इस गंगा को कृष्ण ने अपने मन से प्रकट किया था। गिरिराज पर्वत के ऊपर गोविंदजी का मंदिर है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण यहाँ शयन करते हैं। उक्त मंदिर में उनका शयनकक्ष है। यहीं मंदिर में स्थित गुफ़ा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह राजस्थान स्थित श्रीनाथ द्वारा तक जाती है।


गोवर्धन की परिक्रमा का पौराणिक महत्व है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहाँ की सप्तकोसी परिक्रमा करते हैं। प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा पर यहाँ की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्व है। श्रीगिरिराज पर्वत की तलहटी समस्त गौड़ीय सम्प्रदाय, अष्टछाप कवि एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधना-स्थली रही है।

श्री मुकुट मुखार विंद गिरिराज जी महाराज गोवर्धन 



श्री दानघाटी गिरिराज जी महाराज



श्री मुकुट मुखार विंद गिरिराज जी महाराज जतीपुरा 



दंडवत परिक्रमा




जनवरी 07, 2022

क्यों घट रहे है गिरीराज महाराज ???

 




⚜️ श्री गिरिराज⚜️



➡️  रोज घट रहा है गिरिराज पर्वत, जानिए कहानी


दीपावली के दूसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन और गौ पूजा का विशेष महत्व है। आज गोवर्धन पूजा का पावन पर्व है। इस उपलक्ष्य में हम आपको गोवर्धन पर्वत के बारे में यह जानकारी बता रहे हैं। कान्हा की नगरी मथुरा में स्थित गोवर्धन पर्वत एक समय में दुनिया का सबसे बड़ा पर्वत था। कहा जाता है कि यह इतना बड़ा था कि सूर्य को भी ढ़क लेता था। इस पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में अपनी उंगली पर उठाकर इंद्र के प्रकोप से ब्रज को लोगों की मदद की थी। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। इस पर्वत को लेकर धार्मिक मान्यता है कि यह पर्वत हर रोज तिल भर घटता जा रहा है। गोवर्धन पर्वत के तिल भर घटने की पीछे एक बेहद रोचक कहानी भी है। आइए जानते हैं आखिर क्या वजह है…



➡️  विदेशों से आते हैं श्रद्धालु


भगवान कृष्ण के समान गोवर्धन पर्वत को पवित्र और भगवान का निवास स्थान माना जाता है। इस पर्वत की परिक्रमा लगाने ना सिर्फ देशभर से लोग आते हैं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु यहां परिक्रमा करते हैं। भक्तों का मानना है कि गोवर्धन की परिक्रमा करके वह भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कर रहे हैं। यह परिक्रमा सात कोस यानी 21 किमी है। इस पर्वत का 7 किमी का हिस्सा राजस्थान में आता है और बाकी का हिस्सा उत्तर प्रदेश में आता है।



➡️भक्तों की होती है मनोकामना पूरी


केवल मान्यता नहीं है बल्कि विशेषज्ञों ने भी बताया है कि 5 हजार साल पहले गोवर्धन पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था और अब यह पर्वत केवल 30 मीटर ही रह गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने ही ब्रज के लोगों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया था, तभी से इस पर्वत की पूजा और परिक्रमा की जा रही है। यहां पर सभी भक्तों की मनोकामना पूरी होती है और कोई खाली हाथ नहीं लौटता। साथ ही ना कोई भूखा रहता।



➡️यह है गोवर्धन पर्वत की कथा


गोवर्धन पर्वत के हर रोज घटने का कारण ऋषि पुलस्त्य का शाप है। कथा के अनुसार, एक बार ऋषि पुलस्त्य गिरिराज पर्वत के पास से गुजर रहे थे, तभी उनको इसकी खूबसूरती इतनी पसंद आई की वे मंत्रमुग्ध हो गए। ऋषि पुलस्त्य ने द्रोणांचल पर्वत से निवेदन किया मैं काशी में रहता हूं आप अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दीजिए। मैं उसको काशी में स्थापित करूंगा और वहीं रहकर पूजा करूंगा।



➡️गोवर्धन पर्वत ने रखी यह शर्त


द्रोणांचल पुत्र मोह से दुखी हो रहे थे लेकिन गोवर्धन ने कहा कि हे महात्मा मैं आपके साथ चलूंगा लेकिन मेरी एक शर्त है। शर्त यह है कि आप मुझे सबसे पहले जहां भी रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाउंगा। पुलस्त्य ने गोवर्धन की शर्त को मान ली। तब गोवर्धन ने ऋषि से कहा कि मैं दो योजन ऊंचा और पांच योजन चौड़ा हूं, आप मुझे काशी कैसे लेकर जाएंगे। तब ऋषि ने कहा कि मैं अपने तपोबल के माध्यम से तुमको अपनी हथेली पर उठाकर ले जाउंगा।



➡️ऋषि पुलस्त्य से हो गई भूल


में ब्रज आया, तब गोवर्धन पर्वत को याद आया कि यहां पर भगवान कृष्ण अपने बाल्यकाल में लीला कर रहे हैं। यह सोचकर गोवर्धन पर्वत ऋषि के हाथों में अपना भार बढ़ाने लगे, जिससे ऋषि ने आराम और साधना के लिए पर्वत को नीचे रख दिया। ऋषि पुलस्त्य यह बात भूल गए थे कि उन्हें गोवर्धन पर्वत को कहीं पर भी रखना नहीं है।



➡️क्रोध में ऋषि ने पर्वत को दे दिया शाप


साधना के बाद ऋषि ने पर्वत को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन पर्वत हिला तक नहीं। इससे ऋषि पुलस्त्य बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने शाप दे दिया कि तुमने मेरे मनोरथ को पूर्ण नहीं होने दिया इसलिए अब हर रोज तिल भर तुम्हारा क्षरण होता रहेगा। माना जाता है कि उसी समय से गिरिराज पर्वत हर रोज घट रहे हैं और कलयुग के अंत तक पूरी तरह विलीन हो जाएंगे।


गिरिराज महाराज की जय🙏



जनवरी 05, 2022

गिरिराज महाराज की पौराणिक कथा



⚜️श्री गिरिराज⚜️

भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश में मथुरा नगर के पश्चिम दिशा में लगभग 21 किमी की दूरी पर यह गिरिराज पर्वत विराजमान है। जो की 4 या 5 मील लगभग 21 किमी तक फैला हुआ है। इस पर्वत पर अनेक पवित्र स्थल है। इसी पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अँगुली पर उठा लिया था। गिरिराज पर्वत को गोवर्धन पर्वत भी कहा जाता है।

  

जय हो जय बंदित गिरिराजा, 

ब्रज मण्डल के श्री महाराजा।


गर्ग संहिता में गोवर्धन पर्वत की वंदना करते हुए इसे वृन्दावन में विराजमान और वृन्दावन की गोद में निवास करने वाला गोलोक का मुकुटमणि कहा गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्री गिरिराजजी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाए थे।

दूसरी मान्यता यह भी है कि जब राम सेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमान जी इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे लेकिन तभी देव वाणी हुई की सेतुबंध का कार्य पूर्ण हो गया है तो यह सुनकर हनुमानजी इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर पुन: लौट गए।


द्रोणगिरी के तुम युवराजा, 

भक्तन के साधौ हौ काजा।

मुनि पुलस्त्य जी के मन भाये, 

जोर विनय कर तुम कूं लाये।


पौराणिक उल्लेखों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के काल में यह अत्यन्त हरा-भरा रमणीक पर्वत था। इसमें अनेक गुफ़ा अथवा कंदराएँ थी और उनसे शीतल जल के अनेक झरने झरा करते थे। उस काल में ब्रज-वासी गिरिराज पर्वत पर अपनी गायें चराया करते थे, अतः वे उक्त पर्वत को बड़ी श्रद्धा की द्रष्टि से देखते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र की परम्परागत पूजा बन्द कर गोवर्धन की पूजा ब्रज में प्रचलित की थी।


द्वापर अंत भये अवतारी, 

कृष्णचन्द्र आनन्द मुरारी।

महिमा तुम्हरी कृष्ण बखानी, 

पूजा करिबे की मन ठानी।


भगवान श्रीकृष्ण के काल में इन्द्र के प्रकोप से एक बार ब्रज में भयंकर वर्षा हुई। उस समय सम्पूर्ण ब्रज जल मग्न हो जाने का आशंका उत्पन्न हो गई थी। भगवान श्री कृष्ण ने उस समय गोवर्धन के द्वारा समस्त ब्रजवासियों की रक्षा की थी। भक्तों का विश्वास है, श्री कृष्ण ने उस समय गोवर्धन को छतरी के समान धारण कर उसके नीचे समस्त ब्रज-वासियों को एकत्र कर लिया था, उस अलौकिक घटना का उल्लेख अत्यन्त प्राचीन काल से ही पुराणादि धार्मिक ग्रन्थों में और कलाकृतियों में होता रहा है।


स्वयं प्रकट हो कृष्ण पूजा में, मांग मांग के भोजन पावें।

लखि नर नारि मन हरषावें, जै जै जै गिरिवर गुण गावें।

देवराज मन में रिसियाए, 

नष्ट करन ब्रज मेघ बुलाए।

छाया कर ब्रज लियौ बचाई, 

एकउ बूंद न नीचे आई।


सात दिवस भई बरसा भारी, 

थके मेघ भारी जल धारी।

कृष्णचन्द्र ने नख पै धारे, 

नमो नमो ब्रज के रखवारे।

करि अभिमान थके सुरसाई, क्षमा मांग पुनि अस्तुति गाई।

त्राहि माम मैं शरण तिहारी, क्षमा करो प्रभु चूक हमारी।


ब्रज के भक्त कवियों ने इस पौराणिक कथा उल्लेख बहुत उत्साह से वर्णित किया है।

गिरिराज महाराज की जय


गोवर्धन परिक्रमा वर्णन

श्री गोवर्धन महाराज मथुरा नगर के पश्चिम में लगभग 21 किमी की दूरी पर यह पहाड़ी स्थित है। यहीं पर गिरिराज पर्वत है जो 4 या 5 मील तक फैला हुआ ह...